Tuesday, December 8, 2009

छुट ते हुए एक हाथ को......

तुम्हारा हाथ मेरे इस हथेली पे रखो,
इन उलझी सुलझी रेखाओं में
में अपनी नाम की एक रेखा द्धुंडू...
इस एक पल में जी लूँ
जींदगी सदिओं की.......
देख लूँ वो सारे सपनों को..
फिर एक बार .,
फिर एक बस एक ही बार....
छू लूँ वो सदिओं पुराणी अरमानों को ,
अपनी कल क्या पता .... अपनी ही हो के नही...
ज़रा आज जी लूँ ....इस पल तुम्हारे हाथ पकडे ..
तुम अपनी हथेली..........
मेरे इस हाथ पे रखो ,
इन उलझी सुलझी रेखाओं के बीच ,
में अपनी नाम की भी एक रेखा बना लूँ

Tuesday, December 16, 2008

सपना

इस सपने की सारे पात्र
काल्पनिक हें .
सरी घटनाएँ
काल्पनिक हें
यदि कोई पात्र
या घटना की समानता
कहीं और दिखाती हे
तो ये एक सयोंग मात्र हे ..

Monday, December 15, 2008

इंतजार

इन सर्दिओं मैं
सिगरेट से गुथा धुआं
कम्बल में लिपटी सर्द हवा
तुम्हारी याद में भीगी आंख
कितने अपने बन जाते .
में सुबह की पिली धुप
उन्ग्लिओं से छूता
कोहरे में छुप जाती ,
ये सुबह कितना अपना लग ता

तुम्हें पाता हे न
सुबह की चाय में सकर की अनुपात

Thursday, December 11, 2008

डर

एक रात मेरे ही एक पेंटिंग से
सारे किरदारों ने मुझे पूछा
भाई कलाकार , तुम सोचते कुछ हो
और , बनाते कुछ और ,
ऐसा क्यूँ ?
मैंने कुछ नही बोला
,अगले दिन
मेरे पेंटिंग से सारे किरदार
फरार ....
आज कल में ,
जो पेंटिंग करता हु वही सोचता हूँ . . .

Wednesday, December 10, 2008

कविता

एक पूरानी एलबम से
पूरानी तस्बीर
खिड़की से आती हवा
दूध उबलने की खुशबू
हर कोई जाने और आने वाले की आहट
सुबह की पहली गाड़ी . .
तुमको लिखी हुई एक पुरानी तारीख का ख़त

ये सब मिल ने लगे हें
कहीं कहीं ..
यादों में . .
हम तो भूल चुके थे

उस हर बात को ....
कब से ..

Thursday, December 4, 2008

कविता

----1------
तुम को याद करके . . .!
प्रणब प्रकाश.



थोड़ा सा वक्त
मेरा भी तुम्हारी घड़ी में रखो
फिर इसको अपनी कलाई में बांधो
तब पता चलेगा
की एक दिन चोबीस घंटे में
क्यूँ नहीं गुज़रती ......
एक थोड़ा सा समय मेरा भी
उस घड़ी में रखो
फिर देखो
तुम्हारी घड़ी के तीनों सुई
क्यूँ नही छू पाती
मेरे वक्त को ......

तुम्हारी कलाई पे बंधी
घड़ी को फ़ेंक दो

फिर देखो
सुबह, शाम ,सर्दी , गर्मी, बारिश
कैसे आते हैं

ट्रेन , बस , और सरकारी दफ्तरी की तरह टाइम पे ........
. . .प्रणब प्रकाश

-----2-----
सपने दो .

दे सको तो कुछ सपने दो
सारी सचाई ले लो . . .
तुम्हारे साथ बीतने दो . .
कुछ पल , कुछ लमहा
उजाला अँधेरा
दिन या रात
सपने में

सपने दो गर देसको
दे सको तो कुछ सपने दो.........

( इक पुरानी कविता से )


.3


.....अक्तूबर

जो भी मिल गया
यूं ही रह चलते
लेलेना साथ . . .
क्या पता ., कब अकेला होना पड़े

Wednesday, December 3, 2008

काहानी

तस्बीर
---- .
प्रणब प्रकाश



सन्दुक में माँ की शादी के जोड़े की तरह पुरानी होचुकिथि वो दुपहर ! की याद भी नहीं आती मिड अप्रेल की बह दुपहर में गर्मी कितनी थी ! उसका ठंडा हाथ पकड़के जब में इंडिया गेट से कनाटप्लेस तक पैदल तय कर चुके थे ..! अब ये भी याद नही की वो कौन सा हाथ था ....सायद बयां हाथ, तो फिर उसका झोला दाएं कंधे पर लटका होगा !सायद बयां हाथ पकडा था , तो फिर उसका झोला दाएं कंधे पर होगा ,.बह कौन सी कपडे पहनी हुईथी ..............
यादों की उस तस्बीर में मैंने उसको उसकी हर लिवाजों में देख चूका था , और वो हर लिवाज़ में बेहद खुबसूरत लग रहीथी . . . .



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