तुम्हारा हाथ मेरे इस हथेली पे रखो,
इन उलझी सुलझी रेखाओं में
में अपनी नाम की एक रेखा द्धुंडू...
इस एक पल में जी लूँ
जींदगी सदिओं की.......
देख लूँ वो सारे सपनों को..
फिर एक बार .,
फिर एक बस एक ही बार....
छू लूँ वो सदिओं पुराणी अरमानों को ,
अपनी कल क्या पता .... अपनी ही हो के नही...
ज़रा आज जी लूँ ....इस पल तुम्हारे हाथ पकडे ..
तुम अपनी हथेली..........
मेरे इस हाथ पे रखो ,
इन उलझी सुलझी रेखाओं के बीच ,
में अपनी नाम की भी एक रेखा बना लूँ
Tuesday, December 8, 2009
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