तस्बीर
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प्रणब प्रकाश
सन्दुक में माँ की शादी के जोड़े की तरह पुरानी होचुकिथि वो दुपहर ! की याद भी नहीं आती मिड अप्रेल की बह दुपहर में गर्मी कितनी थी ! उसका ठंडा हाथ पकड़के जब में इंडिया गेट से कनाटप्लेस तक पैदल तय कर चुके थे ..! अब ये भी याद नही की वो कौन सा हाथ था ....सायद बयां हाथ, तो फिर उसका झोला दाएं कंधे पर लटका होगा !सायद बयां हाथ पकडा था , तो फिर उसका झोला दाएं कंधे पर होगा ,.बह कौन सी कपडे पहनी हुईथी ..............
यादों की उस तस्बीर में मैंने उसको उसकी हर लिवाजों में देख चूका था , और वो हर लिवाज़ में बेहद खुबसूरत लग रहीथी . . . .
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Wednesday, December 3, 2008
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1 comment:
bahut hi khubsorat kavita hai,,,,!
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